पटना, 25 अक्टूबर 2025:
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बीच दल-बदल की राजनीति ने एक नया मोड़ ले लिया है। राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) की महिला शाखा की पूर्व प्रमुख प्रतिमा कुशवाहा ने आज पार्टी छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का दामन थाम लिया।
यह कदम न केवल एनडीए को मजबूती देने वाला माना जा रहा है, बल्कि महागठबंधन, खासकर आरजेडी के लिए एक झटका भी है — क्योंकि यह घटना सीधे कुशवाहा (कोइरी) समाज के वोट बैंक को प्रभावित कर सकती है।
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष और विधि मंत्री दिलीप जायसवाल ने पटना स्थित पार्टी कार्यालय में आयोजित एक छोटे समारोह में प्रतिमा को पार्टी की प्राथमिक सदस्यता दिलाई।
समारोह का आयोजन और माहौल
समारोह दोपहर करीब 12 बजे बीजेपी कार्यालय में हुआ, जिसमें पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय मयूख समेत कई कार्यकर्ता मौजूद थे।
मंच पर पहुंचते ही प्रतिमा कुशवाहा ने आरजेडी का झंडा छोड़ा और बीजेपी का भगवा पटका पहनते हुए कहा —
“मोदी-नीतीश जिंदाबाद, एनडीए की जीत हो।”
इस कार्यक्रम में करीब 50 से अधिक कार्यकर्ता शामिल हुए, जिनमें ज्यादातर कुशवाहा समाज से थे।
बीजेपी ने इस कदम को “घर वापसी” करार दिया, जबकि आरजेडी ने इसे “खरीद-फरोख्त की राजनीति” बताया।
प्रतिमा कुशवाहा का बयान
बीजेपी में शामिल होने के बाद प्रतिमा कुशवाहा ने कहा —
“आरजेडी में परिवारवाद हावी है। वहां महिलाओं और सामान्य कार्यकर्ताओं की कोई सुनवाई नहीं होती।
मैं बीजेपी में आकर विकास और महिला सशक्तिकरण के एजेंडे को मजबूत करूंगी।”
उन्होंने तेजस्वी यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि उनकी पार्टी केवल वादों पर चलती है, जबकि
“एनडीए ने बिहार को बिजली, पानी और रोजगार दिया है।”
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राजनीतिक सफर और पृष्ठभूमि
प्रतिमा कुशवाहा लंबे समय तक आरजेडी महिला विंग में सक्रिय रहीं और पार्टी के सामाजिक न्याय अभियान में अहम भूमिका निभाती थीं।
वह 2020 विधानसभा चुनाव के दौरान आरजेडी की प्रमुख प्रचारक रहीं, लेकिन टिकट न मिलने से नाराज थीं।
बिहार में कुशवाहा समाज (लगभग 4-5% जनसंख्या) हमेशा से राजनीतिक रूप से प्रभावशाली रहा है।
यह वर्ग पारंपरिक रूप से सामाजिक न्याय की राजनीति से जुड़ा रहा, लेकिन हाल के वर्षों में इसका एक बड़ा हिस्सा
जेडीयू और बीजेपी की ओर झुका है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रतिमा कुशवाहा का बीजेपी में शामिल होना,
कुशवाहा वोट बैंक को एनडीए की ओर झुकाने की रणनीति का हिस्सा है।
बीजेपी और एनडीए की प्रतिक्रिया
बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष दिलीप जायसवाल ने स्वागत करते हुए कहा —
“पूरे बिहार में एनडीए के पक्ष में लहर है।
आरजेडी जैसे परिवारवादी दलों से असंतुष्ट नेता खुद हमारे साथ आ रहे हैं।
प्रतिमा कुशवाहा बिहार की महिलाओं की नई आवाज बनेंगी।”
उन्होंने आरजेडी पर निशाना साधते हुए कहा कि
“वहां लालू परिवार के अलावा किसी की जगह नहीं है, और जनता यह भली-भांति जानती है।”
जेडीयू नेताओं ने भी इस कदम को “कुशवाहा समाज को एकजुट करने वाला कदम” बताया।
बीजेपी ने प्रतिमा को मगध और कोसी क्षेत्र में महिला प्रचार अभियान की जिम्मेदारी सौंपी है।
आरजेडी और महागठबंधन की प्रतिक्रिया
आरजेडी ने प्रतिमा के बीजेपी में शामिल होने को “दल-बदल की साजिश” बताया।
पार्टी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा —
“बीजेपी पैसे और पद के लालच में नेताओं को खरीद रही है।
प्रतिमा का जाना हमें कमजोर नहीं करेगा, बल्कि जनता का गुस्सा बढ़ाएगा।”
तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया पर लिखा —
“एनडीए का जंगलराज लौट रहा है। असली लड़ाई सड़कों पर होगी,
न कि खरीद-फरोख्त की राजनीति से।”
महागठबंधन में यह घटना चर्चा का विषय बन गई है, क्योंकि हाल ही में
जेडीयू के पूर्व सांसद संतोष कुशवाहा और कुछ अन्य नेता आरजेडी में शामिल हुए थे।
अब यह सेंध उल्टी दिशा में लगती दिख रही है।
जातिगत असर और चुनावी गणित
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, कुशवाहा समाज पर एनडीए और महागठबंधन दोनों की नजर है।
यह समाज बिहार के मगध, भोजपुर, और कोसी क्षेत्र में निर्णायक भूमिका निभाता है।
एनडीए को उम्मीद है कि प्रतिमा के आने से
30 से अधिक सीटों पर कुशवाहा मतदाता प्रभावित होंगे।
विश्लेषक डॉ. राम पुनियानी का कहना है —
“दल-बदल चुनाव के समय आम बात है,
लेकिन कुशवाहा जैसे प्रभावशाली समुदाय का झुकाव एनडीए के लिए बड़ा लाभ साबित हो सकता है।”
प्रतिमा कुशवाहा को आगामी चुनाव में किसी सीट से टिकट मिलने की संभावना जताई जा रही है,
हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि और भविष्य
यह घटना चुनाव से पहले एनडीए के “विकास बनाम परिवारवाद” वाले नैरेटिव को मजबूती देती है।
बीजेपी इसे “महिला नेतृत्व और सामाजिक प्रतिनिधित्व” के प्रतीक के रूप में प्रचारित कर रही है।
पिछले हफ्ते ही आरजेडी के पूर्व विधायक अनिल कुमार सहनी और
कांग्रेस के बच्चू प्रसाद बिरू भी बीजेपी में शामिल हुए थे।
इन लगातार दल-बदल की घटनाओं ने बिहार की सियासत को और गरमा दिया है।
संभावित प्रभाव:
- एनडीए को कुशवाहा समाज के बीच लाभ
- आरजेडी में आंतरिक असंतोष उजागर
- महिला नेतृत्व पर बीजेपी का जोर
- जातिगत समीकरणों में बदलाव की शुरुआत









